बुधवार, 29 मई 2013

सांझ


.बेरा ऐती न  ओती बेरा बुडत रहीस,
करिया रंग बादर ले सुघ्घर उतरत रहिस,
वो सांझ, सुघ्घर परी असन,
धीरे धीरे धीरे...............
बुड़ती म, फेर कोनो मेर नईये चंचलता के आभास,
ओखर दुनो होट ले टपकत हे मधुरस,
फेर कतका हे गंभीर .... न हसी न ठिठोली,
हंसत  हे त एकेठन तारा,
करीया करीया चूंददी म ,
संझारानी के मांग संवारत।
..........रमेश........