गुरुवार, 23 मई 2013

-ःःमेघा काबर छाय हेःः-



    माघ के उतरति म अऊ बेरा के बूडती म,
    मेघा काबर छाय हे ये बसंत बर काबर मंतियायें  हे ।

    लूहूर तूहूर अपन बिदाई म आसू  बहावत हे,
    सुरूर सुरूर पुरवाही ओखर साथ निभावत हे ।

    अभी बरफ ह बरोबर टघले नईये,
    ओला ये फेर काबर जमाय है ।

    अभी अभी लइका के दाई सेटर ल संदूक म धरे हे,
    तेला ये बादर रोगहा फेर निलकलवाये बर परे हे ।

    ओनाहारी अभीच्चे फूल धरे हे तेंला ये काबर झर्राय हे ।
    सुघ्घर सपना देखत किसान ल हिलोर के काबर जगायें है।
   
    सावन भादों जब ऐखर जरूरत रहिस त अब्बड़ तरसाये हे ।
    आज चनामन के माते हे फूल तेन ल झर्रायेबर आये हे ।

    जइसे गांव के गौटिया काम म पइसा नई देवय,
    अऊ अपन काम बर फोकट म दारू पियाये हे ।

    ये बादर काम बर ठेंगा देखायें हे,
    अऊ आज फोकट के बरसाय हे ।
    ...................‘‘रमेश‘‘.........................