शुक्रवार, 24 मई 2013

जय हो दारू

 
ऐती ओती चारो कोती एकेच जयकारा हे ।
जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू।।

कोनो कहय ये नवा जमाना के चलन हे,
त कोनो कोनो कहय ये काम हे शैतानी ।
आज के मनखे तोर संग करे हे मितानी ,
लइका सीयान या होय जवान सबो हे तोर मयारू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू

दूघ गली गली बेचाये हे,
तभो ऐला कहां कोनो भाये हे ।
तोला पाये बर मनखे अपन थारी लोटा ल मड़ाय हे,
ऐखरी सेती करम ल ठठाय हे, घर के मेहरारू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू

तोर ठौर ल मिले हे मंदिर के सानी,
गीरा गंभीर हे तोर भगत मन के कहानी ।
तोर भगत सुत उठ के तोरे दरस ल पाथे,
बिहनिया, मझनिया,अऊ संझा तीनों बेर हाजरी लगाथे ।
तभो ले तोर भक्तन मन तोला पाय बर अऊ अऊ ललचाथे,
तोर भगत मन के भगती ह हवय चारू-चारू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू

कोनो कोनो भगतन अपन घर-कुरीया घला चढ़ाये हे,
कोनो कोनो दुरपती कस अपन बाई ल दाव म लगाये हे ।
लइका बच्चा के घला ओला चिंता कहां सताये हे,
तभे तो जम्मा घर के जिनीस वो ह बेच खाये हे ।
अब तो वो तोर दुवारी म लगावत हे झाडू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू

तोर भगती म कुछ भगतन एइसे समाधी लगाये हे,
मनखे ल कोन कहय कुकुरमन घला पानी चढ़ाये हे ।
ईखर आन बान अऊ षान भोले बाबा ले कहां कम हे,
चिखला, घुरूवा, कचरा ईखर बर फुल आसन सम हे ।
कहत हे ‘रमेश‘ अऊ जम्मो भगतन मन देवत हे हुकारू ।। जय हो दारू, जय हो दारू, जय हो दारू