बुधवार, 29 मई 2013

काबर हे

काबर हे
मोर हरियर भुईया के रंग, लाल होवत काबर हे ।
मोर सोनचिरईयां कस ये धरती, रोवत काबर हे ।।

हमर मन के विकास इखर आंखी म गड़त काबर हे ।
जब पाथे तब ऐमन लाल सलाम देवत काबर हे ।

का इखर तरक्की के सोच हमर ले आगर हे ।
त तरक्की के रद्दा छोड बंदूक धरे काबर हे ।

जंगल के संगी निच्चट भोला-भाला शांति के सागर हे ।
तेखरमन के मन म अशांति के बीजा बोवत काबर हे ।

जंगली के पक्का हितैशी अपन ल देखावत काबर हे ।
बंदूक के छांव म घिरार घिरार के जियावत काबर हे ।

लोकतंत्र के देश म अपन तानाशाही चलावत काबर हे ।
लोकतंत्र के रखवार ल मौत के घाट उतारत काबर हे ।

हिम्मत हे त आगू म आके हाथ दू चार करय,
ओधा बेधा पाछू ले झगरा ल चलावत काबर हे ।

भोला भाला जनता, लाचार करमचारी जवान नेता,
कोखरो होय बलिदान अबतक बेकार होवत काबर हे ।

जब कंधा ले कंधा मिलाके के हमला चलना हे,
त हमार ये नेता मन अपनेच म लड़त काबर हे ।

अइसन अत्याचारी मन ल कोनो मन भोभरावत काबर हे ।
हमर देश के सरकार अपन इच्छाशक्ति ल लुकावत काबर हे ।

मोर धान के कटोरा म ऐमन खून भरत काबर हे ।
मोर भुईंया के मनखे मन बेखबर  सोवत काबर हे ।