सोमवार, 3 जून 2013

अब कहां लुकागे


मया प्रित के बोली,
तोर हसी अऊ ठिठोली,
अब कहां लुकागे.........
तोला देखे के बड़ साध,
ओधा बेधा ले रहंव मै ताक,
ओ तकई,
अब कहां लुकागे ..........
कनेखी आंखी ले तोर देखई,
संग म सुघ्घर तोर मुच मुचई,
ओ मुच मुचई,
अब कहां लुकागे ........
ओ छुप छुप के मिलई
मया मा  खिलखिलई,
ओ खिलखिलई
अब कहां लुकागे.........
तोर संग जीना अऊ संग मरना,
तोर संग रेंगना अऊ संग घुमना,
ओ घुमई ,
अब कहां लुकागे............
तोर रूठना
मोर मनाना
ओ मनई
अब कहां लुकागे.........
बिहाव करे हन के पाप
का ये होगे हे अभिषाप,
हाय रे रात दिन के कमई
 ओ दिन
अब कहां लुकागे.......
लइका मन गे हे बाढ़,
चिंता मुड़ी म गे हे माढ
लइकामन संग खेलई,
अब कहां लुकागे..................
लइका मन ल पढ़ाना हे लिखाना हे,
जिनगी ल जिये बेर कुछु बनाना हे,
हमर बनई,
अब कहां लुकागे ...............
जिये बर जियत हन,
मया घला करत हन
चिंता म चिचीयावत हन,
अपन गीत कहां गावत हन,
हमर मया प्रित के गीत,
ओ गुनगुनई,
अब कहां लुकागे.......