सोमवार, 15 जुलाई 2013

मोरो मन हरियर

तोर मया के छांवे म, गोरी मोरो मन हे हरियर ।
चंदा कस तोर बरन, देख मोरो मन हे हरियर ।।

करिया हिरा कस चुन्दी, पाटी पारे लगाये फुन्दी,
तोर खोपा के बगिया म, भवरा कस मन हे हरियर ।

तरिया म फूले कमल, ओइसने हे तोर नयन,
देख कमल सरोवर ल, गावय मोर मन ये हरियर ।

ओट तोर गुलाब के पंखुडी, करत हे महक झड़ी,
ये गुलागी महक म, झुमय मोरो मन हरियर ।

माथे के टिकली, टिमटिमात हे मोर अंतस भितरी,
ऐखर ऐ अंजोर म, दमकत हे मोर मन हरियर ।

कभू कान म झुमका, कभू येमा डोलय बाली,
विश्मामित्र के मेनका कस, डोलावय मोरो मन हरियर ।

कनिहा के करधनिया, अऊ गोडे के पैयजनिया,
बोलय छुम छुम छनानना, नाचय गावय मोर मन हरियर ।

कोयल कस गुतुर बोली, अऊ गुतुर गुतुर तोर ठिठोली,
बोली अऊ ठिठोली के, समुदर म गोता खावय मोर मन हरियर ।

तै कही सकथस मोला कुछु कुछु, तै तो मोरे सबे कुछु,
तोर बिना नई जानव काहीं कुछु मोर मन हरियर ।

..........‘‘रमेश‘‘.........................

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

सपना म तैं

देखत हव,
कब ले गोरी तोला,
आंखी पिरागे ।

काबर कहे,
आवत हव मै ह,
ले मुरझागे ।

हाथ के फूल,
संजोय रहेव मै,
बिहनीया के ।

होगे रे सांझ,
मन मीत आबे रे,
सपना म तैं ।

..‘‘रमेश‘‘....

शनिवार, 6 जुलाई 2013

अब का देखव

मोर मन ल इही ह भाये हे कोनो परी ल अब का देखव ।
ओखर सिरत ले मन गदगदाये हे सुरत ल अब का देखव ।।

जब ले जाने हव ओला अपन सुरता कहां हे मोला ..
मोर अंतस म होही समाय हे मुहाटी ल अब का देखव ।।

जइसे मोर छांव मोर संग रेंगथे सुटुर सुटुर.........
मोर मन करथे धुकुर धुकुर ओखर मन ल अब का देखव ।।

चंदा के संगे संग चांदनी चंदा ल देखे चकोर....
पतंगा के दिया संग जरई अपन जरई ल अब का देखव ।।

मोर मया ओखर बर ओखर मया मोर बर.
मया घुर गे जस शक्कर म पानी अपन पानी ल अब का देखव ।।

............‘‘रमेश‘‘.......................

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

मीठ -मीठ सुरता


ये मीठ -मीठ सुरता, नई बनतये कुछु कहासी रे ।
कभू कभू आथे मोला हासी, कभू आथे रोवासी रे ।।

दाई के कोरा, गोरस पियेव अचरा के ओरा ।
कइसन  अब मोला आवत हे खिलखिलासी रे ।।

दाई  के मया, पाये पाये खेलाय खवाय ।
अपन हाथ ले बोरे अऊ बासी रे ।।

दाई ल छोड़के, नई भाइस मोला कहूं जवासी रे ।
लगत रहिस येही मथुरा अऊ येही काषी रे ।।

ददा के अंगरी, धर के रेंगेंव जस ठेंगड़ी ।
गिरत अपटत देख ददा के छुटे हासी रे ।।

ददा कभू बनय घोड़ा-घोड़ी , कभू करय हसी ठिठोली ।
कभू कभू संग म खेलय भौरा बाटी रे ।।

कभू कभू ददा खिसयावय कभू दाई देवय गारी रे ।
करेव गलती अब सुरता म आथे रोवासी रे ।।

निगोटिया संगी, संग चलय जस पवन सतरंगी ।
पानी संग पानी बन खेलेन माटी संग माटी रे ।।

आनी बानी के खेल खेलेन कभू बने बने त कभू कभू झगरेन ।
कभू बोलन कभू कभू अनबोलना रह करेन ठिठोली रे ।।

ओ लइकापन के सुरता अब तो मोला आथे मिठ मिठ हासी रे ।
गय जमाना लउटय नही सोच के आवत हे रोवासी रे ।।
.-रमेशकुमार सिंह चैहान