शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

गंवा गे जी गांव

    गंवा गे जी गांव, कहूं देखे हव का गा ।
    बइठे कोनो मेर, मुड़ी मा बांधे पागा ।।
    खोंचे चोंगी कान, गोरसी तापत होही ।
    मेझा देवत ताव, देख इतरावत होही ।।1।।

    कहां खदर के छांव, कहां हे पटाव कुरिया ।
    ओ परछी रेंगान, कहां हे ठेकी चरिया ।।
    मूसर काड़ी मेर, हवय का संगी बहना ।
    छरत टोसकत धान, सुनव गा दाई कहना ।।2।।

    टोड़ा पहिरे गोड़, बाह मा हे गा बहुटा ।
    कनिहा करधन लोर, सूतिया पहिरे टोटा ।।
    सुघ्घर खिनवा ढार, कान मा पहिरे होही ।
    अपने लुगरा छोर, मुडी ला ढाॅंके होही ।।3।।

    पिठ्ठुल छू छूवाल, गली का खेलय लइका ।
    ओधा बेधा मेर, लुकावत पाछू फइका ।।
    चर्रा खुड़वा खेल, कहूं का खेलय संगी ।
    उघरा उघरा होय, नई तो पहिरे बंडी ।।4।।

    घर मोहाटी देख, हवय लोहाटी तारा ।
    गे होही गा खेत, सबो झन बांधे भारा ।।
    टेड़त संगी कोन, देख बारी मा टेड़ा ।
    फरे भाटा पताल, हवय का सुघ्घर केरा ।।5।।

     रद्दा रेंगत जात , धरे अंगाकर रोटी ।
    धोती घुटना टांग, फिरे का देख कछोटी ।।
    पीपर बरगद छांव, ढिले का गढहा गाड़ी ।
    करत बइठ आराम, देख गा मोढ़े माड़ी ।।6।।

    गंवा गे जी गांव, कहूं देखे हव का गा ।
    सबके मया दुलार, टूट गे मयारू धागा ।
    वाह रे चकाचैंध, सबो झन देख भुलागे ।
    सुन ‘रमेश‘ गोहार, गांव ले गांव हरागे ।।7।।