शनिवार, 22 नवंबर 2014

होथे कइसे संत हा (कुण्डलिया)

काला कहि अब संत रे, आसा गे सब  टूट ।
ढोंगी ढ़ोंगी साधु हे, धरम करम के लूट ।।
धरम करम के लूट, लूट गे राम कबीरा ।
ढ़ोंगी मन के खेल, देख होवत हे पीरा ।।
जानी कइसे संत, लगे अक्कल मा ताला ।
चाल ढाल हे एक, संत कहि अब हम काला ।।

होथे कइसे संत हा, हमला कोन बताय ।
रूखवा डारा नाच के, संत ला जिबराय ।।
संत ला जिबराय, फूल फर डारा लहसे ।
दीया के अंजोर, भेद खोलय गा बिहसे ।।
कह ‘रमेष‘ समझाय, जेन सुख शांति ल बोथे ।
पर बर जिथे ग जेन, संत ओही हा होथे ।
-रमेश चौहान
099770695454

सोमवार, 17 नवंबर 2014

पढ़ई लिखई

पढ़ई लिखई सीख के, अपन बदल ले सोच ।
ज्ञान बाह भर समेट के, माथा कलगी खोच ।।
माथा कलगी खोच, दया उपकार अहिंसा ।
तोर मोर ला छोड़, मया कर ले हरहिंछा ।।
मया आय गा नेह, चलव ऐमा घर बनई ।
ऊंच नीच के भेद, मेटथे पढ़ई लिखई ।।

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

बिलवा (कुण्डलियां)

1. बिलवा तोरेे ये मया, होगे जी जंजाल ।
पढ़ई लिखई छूट गे, होगे बारा हाल ।।
होगे बारा हाल, परीक्षा म फेल होके ।
जेल बने घर द्वार, ददा हा रद्दा रोके ।।
पहरा चारो पहर, अंगना लागे डिलवा ।
कइसे होही मेल, संग तोरे रे बिलवा ।।

2. मना दुनो दाई ददा, करबो हमन बिहाव
देखाबो दिल खोल के, अपन मया अउ भाव ।
अपन मया अउ भाव, कहव हम कइसे रहिबो ।
कहव मया ला देख, कहे तुहरे हम करबो।।
सुन के हमरे बात, ददा दाई कहे ह ना।
करबो तुहार बिहाव, करय कोनो न अब मना ।।

-रमेश चौहान

सोमवार, 3 नवंबर 2014

आज देवउठनी हवय



आज देवउठनी हवय, चुहकबो कुसीयार ।
रतिहा छितका तापबो, जुर मिल के परिवार ।।

लक्ष्मी ह कुसीयार बन, जोहे हे भगवान ।
कातिक महिना जाड़ के, छितका ले सम्मान ।।

बिंदा तुलसी हे बने, बिष्णु ह सालिक राम ।
तुलसी बिहाव गांव मा, देखत छोड़े काम ।।

उपास हे मनखे बहुत, ले श्रद्धा विश्वास ।
अंध विश्वास झन कहव, डाइटिंग ल उपास ।।

हमर लोक संस्कृति हवय, हमरे गा पहिचान ।
ईश्वर ला हर बात मा, हम तो देथन मान ।।

रविवार, 2 नवंबर 2014

काम हे तोर लफंगी

अपने तै परभाव, परख ले गा दुनिया मा ।
कहां कदर हे तोर, हवय का घर कुरिया मा ।।
फुलथे जब जब फूल, खुदे ममहाथे संगी ।
फूल डोहड़ी मान, काम हे तोर लफंगी ।।