शनिवार, 4 अप्रैल 2015

देखय जनता हार

नगरी निकाय हा कहय, अपने ला लाचार।
खुदे प्रस्ताव लाय के, खुदे कहय बेकार ।।
खुदे कहय बेकार, बने सपना देखा के ।
आघू के वो शेर, करय का पाछु लुका के ।।
होगे सालों साल, कहत भठ्ठी हा हटही ।
देखय जनता हार, जीत गे निकाय नगरी ।