सोमवार, 25 मई 2015

जागव जागव अब बस्तरिहा

जागव जागव अब बस्तरिहा, लावव संगी नवा बिहान ।
तोर छोड़ के कोनो ऊंहा, कर सकय न थोरको निदान ।।

तपत हवे तूहरे भरोसा, तू ही मन ला ढाल बनाय ।
तू ही मन ला मार मार के, तू ही मन ला खूब डराय ।।

धरे बम्म अउ गोला बारूद, लूटे तोरे तीर कमान ।
जंगल मा ओ कब्जा करके, लूटत हे तोरे पहिचान ।।

काट-काट विकास के रद्दा, जंगल राखे तोला धांध ।
देख सकव झन जग हे कइसे, राखे खूंटा तोला बांध ।।

अपन आप ला मितान कहिके, तोरे गरदन देथे घोठ ।
तोरे बर ओ बनाय फांदा, जीभ निकाले करथे गोठ ।।

एक-एक तो ग्यारा होथे, देखव तुम सब हाथ मिलाय
हो जव लकडी के गठरी कस, गांठ मया के देव लगाय ।

खोल सरग तक अपने पांखी, उड जावव न फांदा समेत ।
कब तक तू मन सूते रहिहव, अब तो हो जावव ग सचेत ।।

जंगल के तू ही मन राजा, भालू चीता षेर हराय ।
बैरी सियार मन ला काबर, अब तू मन रहिथव डरराय ।


दम भर दहाड तै जंगल मा, डारा पाना सुन के झर जाय ।
सियार सुन के दहाड़ तोरे, जिहां रहय ऊंहे मर जाय ।।