रविवार, 7 जून 2015

होय जगत के चार गुरू

होय जगत के चार गुरू, चारो रूप महान ।
पहिली गुरू दाई ददा, जेन हमर भगवान ।।
जेन हमर भगवान, देह दे दुनिया लाये ।
मिलय दूसर म स्कूल, हाथ धर जेन पढ़ाये ।।
तीसर फॅूंके हे कान, सिखाये धरम भगत के ।
आखिर गुरू भगवान, जेन हर होय जगत के ।।

आखिर गुरू भगवान हे, छोड़ाथे भव मोह ।
परम शक्ति ले वो मिला, मेटे परम बिछोेह ।।
मेटे परम बिछोेह, जगत मा आना जाना ।
परम अंश हे जीव, परम से हे मिल जाना।।
गुरू हा देवय ज्ञान, देह ला जानव जस चिर ।
देह देह के प्राण, छोड़ के जाही आखिर ।।