सोमवार, 20 जुलाई 2015

बुड्ती हा लागत हे उत्ती

बुड़ती ले उत्ती डहर, चलत हवे परकास ।
भले सुरूज उत्ती उगय, अंतस धरे उजास ।
अंतस धरे उजास, कोन झांके हे ओला ।
आंखी आघू देख, सबो बदले हे चोला ।।
चले भेडि़या चाल, बिसारे अपने सुरती ।
उत्ती ला सब छोड़, देखथे काबर बुड़ती ।।

जेती ले निकले सुरूज, ऊंहा होय बिहान ।
बुड़े जिहां जाके सुरूज, रतिहा ऊंहा जान ।।
रतिहा ऊंहा जान, जिहां सब बनावटी हे ।
चकाचैंध के घात, चीज सब सजावटी हे ।।
पूछत हवे ‘रमेश‘,  तुमन जाहव गा केती ।
सिरतुन होय उजास, सुरूज हा होथे जेती ।।

उत्ती के बेरा सुरूज, लगथे कतका नीक ।
उवत सुरूज ला देख के, आथे काबर छीक ।।
आथे काबर छीक, करे कोनो हे सुरता ।
जींस पेंट फटकाय, छोड़ के अपने कुरता ।।
सुरूज ढले के बाद, जले हे दीया बत्ती ।
बुड़ती नजर जमाय, खड़े काबर हे उत्ती ।।