रविवार, 26 जुलाई 2015

मुड धर कविता रोय

स्रोता बकता देख के, मुड धर कविता रोय ।
सुघ्घर कविता के मरम, जानय ना हर कोय ।।
जानय ना हर कोय, अपन ओ जिम्मेदारी ।
दूअरथी ओ बोल, देत मारे किलकारी ।।
ओखर होथे नाम, जेन देथे बड़ झटका ।
सुनत हवे सब हाॅस, मंच मा स्रोता बकता ।

आनी बानी गोठ कर, देखावत हे ठाठ
एक गांठ हरदी धरे, मुसवा बइठे हाठ ।।
मुसवा बइठे हाठ, भीड़ ला बने सकेले ।
जेखर बल ला पाय, होय बइला हूबेले ।।
छटे सबो जब भीड़, फुटय ना मुॅह ले बानी ।
एके ठन हे गांठ, कहां हे आनी बानी ।।

जइसे ओखर नाम हे, दिखे कहां हे काम ।
कड़हा कड़हा बेच के, पूरा मांगे दाम ।।
पूरा मांगे दाम, अपन लेवाल ल पाये ।
मिलावटी हे झार, तभो सबला भरमाये ।।
चिन्हे ना सब सोन, सोन पालिस हे कइसे ।
बेचे से हे काम, बेचा जय ओहर जइसे ।।