मंगलवार, 14 जुलाई 2015

अटकन बटकन दही चटाका

अटकन बटकन दही चटाका । झर झर पानी गिरे रचाका
लउहा लाटा बन के कांटा । चिखला हा गरीब के बांटा

तुहुुर तुहुर पानी हा आवय । हमर छानही चूहत जावय
सावन म करेला हा पाके । करू करू काबर दुनिया लागे

चल चल बेटी गंगा जाबो । जिहां छूटकारा हम पाबो
गंगा ले गोदावरी चलिन । मरीन काबर हम अलिन गलिन

पाका पाका बेल ल खाबो । हमन मुक्ति के मारग पाबो
छुये बेल के डारा टूटे । जीये के सब आसा छूटे

भरे कटोरा हमरे फूटे । प्राण देह ले जइसे छूटे
काऊ माऊ छाये जाला । दुनिया लागे घात बवाला