रविवार, 19 जुलाई 2015

उठ तैं भिनसार

छोड़ अलाली जाग तैं, होगे हवय बिहान ।
चढ़त जात हे गा सुरूज, देख निहार मितान ।।
देख निहार मितान, डोहड़ी घला फूलगे ।
चिरई चिरगुन बोल,  हवा मा कइसे मिलगे ।
हवा लगत हे नीक, नीक हे बादर लाली ।
उत्ती बेरा देख, जाग तैं छोड़ अलाली ।।

कुकरा हा भिनसार के, बोलत हे गा बोल ।
जाग कुकरू कू जाग तैं, अपन निंद ला खोल ।।
अपन निंद ला खोल, छोड़ खटिया पलंग गा ।
घूमव जाके खार, बनव संगी मतंग गा ।।
कर लव कुछु व्यायाम, बात ला झन तो ठुकरा ।
घेरी घेरी बेर, कुकरू कू बोलत कुकरा ।।

पुरवाही सुघ्घर चलत, गुदगुदात हे देह ।
तन मन पाये ताजगी, जेन करे हे नेह ।।
जेन करे हे नेह, बिहनिया ले जागे हे ।
खुल्ला जगह म घूम, हवा ला जे पागे हे ।।
धरती के सिंगार, सबो के मन ला भाही ।
उठ तैं भिनसार, चलत सुघ्घर पुरवाही ।।