सोमवार, 17 अगस्त 2015

काव्य मा रस

सुने पढ़े मा काव्य ला, जउन मजा तो आय ।
आत्मा ओही काव्य के, रस तो इही कहाय ।

चार अंग रस के हवय, पहिली स्थाई भाव ।
रस अनुभाव विभाव हे, अउ संचारी भाव ।।

भाव करेजा मा बसे, अमिट सदा जे होय ।
ओही स्थाई भाव हे, जाने जी हर कोय ।।

ग्यारा स्थाई भाव हे, हास, षोक, उत्साह ।
क्रोध,घृणा,आश्चर्य भय,शम,रति,वतसल,भाह ।।  भाह-भक्ति भाव

कारण स्थाई भाव के, जेने होय विभाव ।
उद्दीपन आलंबन ह, दू ठन तो हे नाव ।।

जेन सहारा पाय के, जागे स्थाई भाव ।
जेन विषय आश्रय बने, आलंबन हे नाव ।।

जेन जगाये भाव ला, ओही विषय कहाय ।
जेमा जागे भाव हा, आश्रय ओ बन जाय ।।

जागे स्थाई भाव ला, जेेन ह रखय जगाय ।
उद्दीपन विभाव बने, अपने नाम धराय ।।

आश्रय के चेश्टा बने, व्यक्त करे हेे भाव ।
करेे भाव के अनुगमन, ओेही हेे अनुभाव ।।

कभू कभू जे जाग के, फेर सूत तो जाय ।
ओही संचारी भाव गा, अपने नाम धराय ।।

चार भाव के योग ले, कविता मा रस आय ।
पढ़े सुने मा काव्य के, तब मन हा भर जाय ।।