मंगलवार, 4 अगस्त 2015

दोेहा-ददरिया

नायिका
सावन मा लागे झड़ी, हरर हरर तो जेठ ।
तोर अगोरा मैं धनी, खड़े दुवारी पेठ ।।
नायक
बात जेठ के छोड़ दे, आगे सावन देख ।
होही हरियर अब छोर हा, अचरा मया समेख ।।
नायिका
सपना जइसे हे लगे, तोर मया के गोठ ।
दरस परस बर तोर गा, जागे पियास पोठ ।।
नायक
साॅस साॅस मा तैं बसे, मोरे साॅस चलाय ।
बैरी गोरी साॅस ले, कइसे तैं बिसराय ।।
नायिका
डारा डारा नाचथे, भवरा देख लुभाय ।
काचा काचा ओ कली, कइसे जाय भुलाय ।।
नायक
कांटा छेदे पंख ला, तभो कली बर जाय ।
भवरा देथे प्राण ला, जग ला मया जनाय ।।
नायिका
मैं अइलावत धान कस, रहेंव गा मुरझाय ।
सावन बरखा बूॅंद कस, मोला तैं जीयाय ।।
नायक
तोरे ले मोरे हवय, जीवन के ये डोर ।
चीत चोर सजनी भला, समझे कइसे चोर ।।
नायिका
बालम तोरे आय ले, आये जीवन मा भोर ।
तोर मया के गोठ ला, बांधे रहिंव छोर ।।
नायक
ऐही आसा विष्वास हा, बने मया के गांठ ।
बोली बतरस मा अपन, हॅसी खुषी ला साट ।।
-रमेेश चौहान