शनिवार, 12 सितंबर 2015

डहत हवे गा बेंदरा

डहत हवे गा बेंदरा, कूद कूद अतलंग ।
खपरा परवा छानही, दिखत हवय बदरंग ।।

तरई आंजन छानही, खपरा गे सब फूट ।
लड़त हवे गा हूड़का, एक दूसर म टूट ।।
मोठ डाठ हे ओ दिखत, कतका दिखत मतंग । डहत हवे गा बेंदरा...

बारी बखरी मैदान हे, खेले जिहां घुलंड ।
दरबर दरबर आय के, बने हवें बरबंड ।।
देखव ईंखर काम हा, लगत हवे बड़बंग । डहत हवे गा बेंदरा...
(बरबंड-पहलवान, बडबंग-बेढंगा)

थक गे सब रखवार हा, इहां बेंदरा भगात ।
चारे दिन के चांदनी, फेर कुलूपे रात ।।
सोचय कुछु सरकार हा, कइसे बदलय ढंग । डहत हवे गा बेंदरा...

जंगल झाड़ी काट के, मनखे करे कमाल ।
रहय कहां अब बेंदरा, अइसन हे जब हाल ।।
छाती मा ओ कूद के, लड़त हवे ना जंग । डहत हवे गा बेंदरा...