मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

कब लाबे बारात

नायक
सरर-सरर डोलत हवय, तोर ओढ़नी छोर ।
संग केष मुॅह ढाक के, रूप निखारे तोर ।।

नायिका
झुलुप उड़े जब तोर गा, मन हरियावय मोर ।
चमक सुरूज कस हे दिखय, मुखड़ा के तो तोर ।।

नायक
गरहन लागय ना तोर मुॅह, चकचक ले अंजोर ।
चंदा कामा पूरही, अइसन मुखड़ा तोर ।

नायिका
गज भर छाती तोर हे, लंबा लंबा बाह ।
झूला झूलत मैं कभू,  कहां पायेंव थाह ।।

नायक
कारी चुन्दी के घटा, छाये हे घनघोर ।
भीतर  मैं धंधाय हॅव, निकलव कोने कोर ।।
 
नायिका
बोली तोरे मोहनी, राखे मोला घोर ।
जांव भला मैं कोन विधि, संगे तोरे छोर ।

नायक
छोड़ जगत के बंधना, बांध मया के गांठ ।
जनम जनम के मेल कर, खाई ला दी पाट ।।

नायिका
हवे अगोरा रे धनी, कब लाबे बारात ।
आके तोरे अंगना, करॅव मया बरसात ।।