शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

छत्तीसगढ़ महतारी के गोहार

करय, छत्तीसगढ़ महतारी, आंसू छलकावत गोहार ।
मोरे लइका मन हा काबर, कइसन लगथव गा बीमार ।।

जब्बर छाती तो तोर रहिस, सह लेत रहे घन के मार।
घी दूध छकत ले पी-पी के, बासी चटनी खाये झार ।।

ओगराय पथरा ले पानी, सुरूज संग तै करे दुलार ।
रहय कइसनो बोझा भारी, अलगावस जस नार बियार ।।

करे कोखरो भले बिगारी, हाथ अपन ना कभू लमाय
जांगर पेरे अपन पेट बर, फोकट मा कभू नई खाय ।

मोरे तो सेवा कर करके, नाचस कूदस मन बहलास ।
अइसन कोन बिपत आगे, काबर मोला नई बतास ।।

मोर धरोहर काबर छोड़े, छोड़े काबर तैं पहिचान ।
बोरे बासी बट्टी रोटी, दार भात के संग अथान ।।

तरिया नदिया पाटे काबर, पाटे काबर तैं खलिहान ।
हाथ धरे तैं घूमत रहिबे, आही कइसे नवा बिहान ।।

काबर दिन भर छुमरत रहिथस, दारू मंद के चक्कर आय ।
काम बुता ला छोड़-छाड़ के, दूसर पाछू दूम हलाय ।।

काल गांव के गौटिया रहे, गरीबहा काबर आज कहाय ।
तोर दुवारी मा लिखे हवे, दू रूपया के चाउर खाय ।

खेत खार तो ओतके हवय, फसल घला तै जादा पाय ।
काय लचारी अइसे आगे, गरीबहा के बांटा खाय ।।

गरीबहा बेटा काबर तैं, धुररा माटी ला डरराय ।
मोरे कोरा खेले खाये, अब काबर तैं आज लजाय ।।

पढ़ लिख होशियार बनव सबो, निज बल बुद्धि अपन देखाव ।
भारत माता के लाज रखव, मोर दूध के लाज बचाव ।।