रविवार, 8 नवंबर 2015

दू ठन मुक्तक

1
गजल शेर के घला नियम होथे ।
लिखे बोले मा जिहां संयम होथे ।।
रदिफ काफिया बिना जाने कतको
गजलकार के इहां नजम होथे ।

2
मन के पीरा हरय कोन ।
ठउरे ओखर भरय कोन ।।
वो हर चलदिस जगत छोड़ ।
रहि के जींदा मरय कोन ।।