शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

महिना आगे पूस के

महिना आगे पूस के, दिन भर लागय जाड़ ।
हाथ-पाव हा कापथे,  जइसे डोले झाड़ ।।

हू हू मुॅह हा तो करय, जइसे सिसरी बोल ।
परे जाड़ जब पूस के, मुक्का होजय ढोल ।।

महिना आगे पूस के, लेही मोर परान ।
ना कदरी ना गोदरी, ना परछी रेगान ।।

कांटा न झिटी गांव मा, दिखे न कोनो खार ।
कहय डहत ये पूस हा, अब तो भूरी बार ।

जानय ना धनवान हा, कइसे होथे पूस ।
कांपत हम बिन चेंदरा, ओ पहिरे हे ठूस ।।