बुधवार, 27 जनवरी 2016

कहमुकरिया

कहमुकरिया
(कहमुकरिया एक छंद होथे, जेमा 16, 16 मात्रा के चार चरण होथे, ये एक अइसन विधा आय जेमा एक सहेली अपन प्रियतम के वर्णन करथे अउ अपन सखी ले पूछथे, जब ओखर सखी हा, उत्तर मा साजन कहिथे तो ओ हा मुकर जाथे अउ आने उत्तर बता देथे, ये विधा मा रचनाकार अउ पाठक के बीच एक जनउला हो जथे)
1.
रहिथे दिन रात संग मोरे,
गोठ बात मा राखे बोरे ।
संग ओखरे करथव स्माइल ।
का सखि ?

साजन !


ना सखि मोबाइल ।।

2.
मोर अकेल्ला के संगी हे,
ज्ञान जेखरे सतरंगी हे ।
जेखर आघू मैं नतमस्तक ।
का सखि ?

साजन !


ना सखि पुस्तक ।

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

चमकत रेंगय टूरी

टाॅठ टाॅठ जिन्स पेंट पहिरे, अउ हल हल ले चूरी ।
बादर कस चुन्दी बगराये, चमकत रेंगय टूरी ।।

पुन्नी के चंदा कस मुहरन, गली गली देखाये ।
अपन देह के रूआब गोरी, डहर डहर बगराये ।
काजर आंजे आंखी कारी, टूरा मन बर छूरी ।
बादर कस चुन्दी बगराये, चमकत रेंगय टूरी ।।

तन के चुनरी पाछू टांगे, बेग हाथ लटकाये ।
गली गली हरहिंछा घूमे, कनिहा ला मटकाये ।
धरे जवानी बरखा आगे, छम छम नाचे मयूरी ।
बादर कस चुन्दी बगराये, चमकत रेंगय टूरी ।।

टाॅठ टाॅठ जिन्स पेंट पहिरे, अउ हल हल ले चूरी ।
बादर कस चुन्दी बगराये, चमकत रेंगय टूरी ।।

सोमवार, 25 जनवरी 2016

अपन फरज निभाबो

रोला छ़द
अपन देश के फर्ज. हमू मन आज निभाबो ।
कामबुता के संग. देश के गीत ल गाबो ।
देशभक्त ला देख. फूल कस बिछ जाबो ।
आघू बैरी देख. हमन बघवा बन जाबो ।।
-रमेश चौहान

जय हिन्द बोल, हरषावव

झंड़ा लहरावव, जनमन गावव, गणतंत्र परब, हे आये ।
घर कुरिया झारव, दीया बारव, देवारी जस, तो भाये ।।
हिन्दू ईसाई, मुस्लिम भाई, जय हिन्द बोल, हरषावव ।
हे पावन माटी, अउ परिपाटी, जग ला जुरमिल, देखावव ।।

रविवार, 24 जनवरी 2016

छेरछेरा

गीतिका छंद
छेरछेरा के परब हे, धान कोदो हेर दौ ।
अन्न देके अन्न पाबे, छेरछेरा मान लौ ।।
मान होथे दान दे ले, दान ले हे मान गा ।
होय ना उन्ना कभू गा, तोर कोठी जान गा ।।

शनिवार, 23 जनवरी 2016

दो मुक्तक

1-
एक बेटा होके दाई बर शेर होगे ।
बहिनी बर कइसे तै ह गेर होगे ।।
एक अनचिनहार नोनी ला पाये
तैं बघवा होके आज ढेर होगे ।।

2-
ददा दाई के खूब सुने
भाई भौजी ला घला गुने
सास ससुरार ला पाये
काबर अपन माथा धुने ।।
-रमेश चौहान

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

डहत सुवारी मोर हे..

डहत सुवारी मोर हे, मइके मा तो जाय ।
पांव परे मा गा घलो, ससुरे ना तो आय ।।

मोर गांव मा पूछ लव, सीधा साधा आॅव ।
दारू मंद ला छोड़ दे, मैं ना पान चबाॅव ।।
अपन काम ले काम हा, मोला बने सुहाय । डहत सुवारी मोर हे..

काबर करे बिहाव हे, जाने ना भगवान ।
कतको बेरा देख ले, मारे केवल शान ।।
देखय ना बोलय कभू, मोला मया लगाय । डहत सुवारी मोर हे ..

केवल एके मांग हे, दाई ददा ल छोड़ ।
मोरे मइके मा चलव, ऐती नाता तोड़ ।
देख लेंव मैं जाय के, तभो ना तो भाय । डहत सुवारी मोर हे..

पढ़े लिखे के साध मा, माथा अपन ठठाॅव ।
धर डंडा कानून के, करे ओ काॅव-काॅव ।
कानून हवय अंधरा, कोन भला समझाय । डहत सुवारी मोर हे..

दुनिया दारी मा अभे, मोर लगे ना चेत ।
मरना जीना काय हे, जस नदिया के रेत ।।
अपन खुदे के छाॅव हा, चाबे बर दउडाय । डहत सुवारी मोर हे..

रविवार, 17 जनवरी 2016

देख देख ये फोटु ला

देख देख ये फोटु ला, पारत हे गोहार ।
बीता भर लइका इहां, गढ़त हवय संसार ।।


लादे अपने पीठ मा, नान्हे भाई छांध ।
राखे दूनो हाथ मा, पाने ठेला बांध।।
दूनो झन के पेट बर, बोहे जम्मा भार । देख देख ये फोटु ला...

अइसन का पीरा हवय, ओखर आंखी देख ।
कहां ददा दाई हवय, दिखे भाग के लेख ।।
आंसु धरे अनाथ मनन, होय आज लाचार । देख देख ये फोटु ला...

मात देत हे काल ला, लइका के ये सोच ।
करम बड़े अधिकार ले, दूसर ला झन नोच ।।
भीख कटोरा ना धरय, जांगर लय सम्हार । देख देख ये फोटु ला...

लइका के तजबीज ला, कोरा अपन उठाव ।
बनके अब दाई ददा, लव बचपना बचाव ।।
धरम करम के देष मा, होही बड़ उपकार । देख देख ये फोटु ला...

सोमवार, 11 जनवरी 2016

हम छत्तीसगढि़या आन रे

हम छत्तीसगढि़या आन रे, छाती मा चढ़ जाबो ।
जेन हमर हक लूटय तेला, जुरमिल नगद ठठाबो ।।

सीधा-सादा बर हम सीधा, घर अॅगना तो ओखर ।
जम्मो दुनिया हा जाने हे, हमरे संगत चोखर ।
नंगरा बनय जेन हमर बर, हमू नंगरा बन जाबो ।।
जेन हमर हक लूटय तेला, जुरमिल नगद ठठाबो ।।


छत्तीसगढ़ी बोली भाखा, हमर करेजा-चानी।
कइसे कोनो कर लेही अब, इहां अपन मनमानी ।।
अपन आन-बान शान बर हम, जिनगी दांव लगाबो ।
जेन हमर हक लूटय तेला, जुरमिल नगद ठठाबो ।।

महानदी के निरमल पानी, जहर जेन हे घोरे ।
हमर चार तेंदु जबरदस्ती, आके जेने टोरे ।
अइसन बैरी के टोटा धर, गली गली घूमाबो ।
जेन हमर हक लूटय तेला, जुरमिल नगद ठठाबो ।।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

छत्तीसगढिया

दाई के गोरस असन, छत्तीसगढी बोल ।
तोर मोर रग मा भरे, देखव ऑखी खोल ।।

हमरे भाखा मा घुरे, दया मया भरपूर ।
मनखे मनखे मन रहय, मनखेपन मा चूर ।।

चाउर पिसान घोर के, लई बना ले फेट ।
गरम चिला हाथ मा, चटनी संग लपेट ।।

धनिया मिरचा संग ले, शील लोढिया घीस ।
बंगाला ला डार के, मन लगा के पीस ।।

गुल गुल भजिया छान ले, दे करईहा तेल ।
गरम गरम धर हाथ मा, गबर गबर तैं झेल ।।
-रमेश चौहान

बुधवार, 6 जनवरी 2016

अब तो बैरी ला मार गिरावव जी

फोकट फोकट झन गोठियाव संगी
काम के बात बतावव जी
कइसे आतंक के नाम बुताही
बने फोर के समझावव जी
कोन परदा के पाछू बइठे
आतंकी पिला जनमावय जी
कोन ओला चारा पानी दे
रुखवा कस सिरजावय जी
कोन जयचंद विभषण बनके
अपने भाई ला मरवावय जी
कबतक हम लेसावत रहिबो
रद्दा कोनो देखावव जी
दूसर मा अतका दम कहां हे
अपने घर संभालव जी
जुंवा-लिख काहेक पट्टा गे हे
अपने मुडी मिंजवावव जी
कबतक हम केवल कहत रहिबो
अब तो बैरी ला मार गिरावव जी

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

चार ठन दोहा

मनखे लीला तोर तो, जाने ना भगवान ।
बन गे दानव देवता, बने नही इंसान ।।

गाली अपने आप ला. कब तक देहू आप ।
चाल ढाल अपने बदल. काबर करथस पाप ॥

करथे सब झन गोठ भर. काम करय ना कोय ।
काम कहू सब झन करय. गोठे काबर होय ॥

बदलव अपने आप ला. बदल जही संसार ।
देख देख संसार ला. काबर बदले झार ॥

तहूँ बने गुरु अउ महूँ. चेला बनही कोन ।
पूछ पूछ ओखर डहर. काबर ब इठे मोन ॥
-रमेश चौहान

सोमवार, 4 जनवरी 2016

कहय शहिद के बेटवा

बादर करिया छाय, कुलुप लागे घर कुरिया ।
कब तक रहि धंधाय, खड़े आतंकी ओ करिया ।।
केवल छाती तान, शहिद सैनिक मन होये ।
हम मारे हन चार, बीस सैनिक ला खोये ।।
कहय शहिद के बेटवा, बैरी के अब घर घुसर ।
बिला म घुसरे साप के, मुड ला पथरा मा कुचर ।।