गुरुवार, 21 जनवरी 2016

डहत सुवारी मोर हे..

डहत सुवारी मोर हे, मइके मा तो जाय ।
पांव परे मा गा घलो, ससुरे ना तो आय ।।

मोर गांव मा पूछ लव, सीधा साधा आॅव ।
दारू मंद ला छोड़ दे, मैं ना पान चबाॅव ।।
अपन काम ले काम हा, मोला बने सुहाय । डहत सुवारी मोर हे..

काबर करे बिहाव हे, जाने ना भगवान ।
कतको बेरा देख ले, मारे केवल शान ।।
देखय ना बोलय कभू, मोला मया लगाय । डहत सुवारी मोर हे ..

केवल एके मांग हे, दाई ददा ल छोड़ ।
मोरे मइके मा चलव, ऐती नाता तोड़ ।
देख लेंव मैं जाय के, तभो ना तो भाय । डहत सुवारी मोर हे..

पढ़े लिखे के साध मा, माथा अपन ठठाॅव ।
धर डंडा कानून के, करे ओ काॅव-काॅव ।
कानून हवय अंधरा, कोन भला समझाय । डहत सुवारी मोर हे..

दुनिया दारी मा अभे, मोर लगे ना चेत ।
मरना जीना काय हे, जस नदिया के रेत ।।
अपन खुदे के छाॅव हा, चाबे बर दउडाय । डहत सुवारी मोर हे..