रविवार, 17 अप्रैल 2016

कहत हे पानी टपकत

टपकत पानी बूंद ला, पी ले तैं खोल ।
टपकत पानी बूंद हा, खोलत हावे पोल ।
खोलत हावे पोल, नदानी हमरे मन के ।
नरवा नदिया छेक, बसे हे मनखे तन के ।।
पाटे कुॅवा तलाब, बोर खनवाये मटकत ।
सुख्खा होगे बोर, कहत हे पानी टपकत ।।