रविवार, 24 अप्रैल 2016

चिंता होथे देख के

चिंता होथे देख के, टूटत घर परिवार ।
पढ़े लिखे पति पत्नि मन, झेल सहे ना भार ।।

जानय ना कर्तव्य ला, चाही बस अधिकार ।
बात बात मा हो अलग, मेट डरे परिवार ।।

मांग भरण पोषण अलग, नोनीमन बउराय ।
टूरा मन हा दारू पी, अपने देह नसाय ।।

राम लखन के देश मा, रावण के भरमार ।
गली गली मा हे भरे, सूर्पनखा हूंकार ।।

कहे कहां मंदोदरी, रावण, बन तैं राम ।
बात नई माने कहूं, जाहूं मयके धाम ।।

सूर्पनखा ला देख के, राम कहे हे बात ।
बसे हवय मुड़ गोड़ ले, सीता के जज्बात ।।

रोठ रोठ किताब पढ़े, राम कथा ला छोड़ ।
अपन सुवारथ मा जिये, अपने नाता तोड़ ।।