बुधवार, 13 अप्रैल 2016

आंखी होथे तीन ठन

श्रद्धा अउ विश्वास हा, आथे अपने आप ।
कथरी ओढ़े घीव पी, राम नाम ला जाप ।।

गलती ले जे सीखथे, अनुभव ओखर नाम ।
जीवन के पटपर डगर, आथे वोही काम ।।

उल्टा तोरे सोच के, दिखय कहू गा बात ।
गुस्सा मन मा फूटथे, लाई कस दिन रात ।।

एक होय ना मत कभू, जुरे चार विद्वान ।
अपन अपन के तर्क ले, बनथे खुदे महान ।।

एक करे बर सोच ला, सुने ल परथे गोठ ।
सुन दूसर के गोठ ला, मनखे होथे पोठ ।।

दवा क्रोध के एक हे, सहनशील मन होय ।
क्षमा दान ला मान दै, शांति जगत मा बोय ।।

दिखय नही चेथी अपन, करलव लाख उपाय ।
गलती चेदी मा बसय, कइसे लेब नसाय ।

देखे बर मुॅह ला अपन, दर्पण चाही एक ।
अपने चारी जे सुनय, बन जाथे ओ नेक ।।

कहिना कोनो बात ला, घात सहज मन मोय ।
काम करे बर कोखरो, जांगर नई तो होय ।।

आंखी होथे तीन ठन, दू जग ला देखाय ।
तीसर आंखी मन हवय, अपने देह जनाय ।।