शुक्रवार, 24 जून 2016

मान सियानी गोठ

झेल घाम बरसात ला, चमड़ी होगे पोठ ।
नाती ले कहिथे बबा, मान सियानी गोठ ।।

चमक दमक ला देख के, बाबू झन तैं मात ।
चमक दमक धोखा हवय, मानव मोरे बात ।।

मान अपन संस्कार ला, मान अपन परिवार ।
झूठ लबारी छोड़ के, अपने अंतस झार ।।

मनखे अउ भगवान के, हवय एक ठन रीत ।
सबला तैं हर मोह ले, देके अपन पिरीत ।।

बाबू मोरे बात मा, देबे तैं हर ध्यान ।
सोच समझ के हे कहत, तोरे अपन सियान ।।

कहि दे छाती तान के, हम तोरे ले पोठ ।
चाहे कतको होय रे, कठिनाई हा रोठ ।।



भौतिकवाद के फेर

भौतिकवाद के फेर । मनखे मन करय ढेर
सुख सुविधा हे अपार । मनखे मन लाचार

मालिक बने विज्ञान । मनखे लगे नादान
सबो काम बर मशीन । मनखे मन लगय हीन

हमर गौटिया किसान । ओ बैरी ये मितान
जांगर के बुता छोड़ । बइठे पालथी मोड़

बइठे बइठे ग दिन रात । हम लमाय हवन लात
अइसन हे चमत्कार । देखत मरगेन यार

पढ़े लिखे हवे झार । नोनी बाबू हमार
जोहत हे बुता काम । कइसे के मिलय दाम

लूटे बांटा हमार । ये मशीन मन ह झार
मशीन हा करय काम । मनखे मन भरय दाम

सुख सुविधा बरबादी । जेखर हवन हम आदि
करना हे तालमेल । छोड़ सुविधा के खेल

बड़े काम बर मषीन । छोट-मोट हम करीन
मषीन ल करबो दास । नई रहन हम उदास

गुरुवार, 23 जून 2016

काठी के नेवता

कोने जानय जिंनगी, जाही कतक दूर तक ।
बेरा उत्ते बुड़ जही, के ये जाही नूर तक ।।

टुकना तोपत ले जिये, कोनो कोनो डोकरी ।
मोला आये ना समझ, कइसे मरगे छोकरी ।।

अभी अभी तो जेन हा, करत रहिस हे बात गा ।
हाथ करेजा मा धरे, सुते लमाये लात गा ।।

रेंगत रेंगत छूट गे, डहर म ओखर प्राण गा ।
सजे धजे मटकत रहिस, मारत जे हा शान गा ।।

देख देख ये बात ला, मैं हा सोचंव बात गा।
मोर मौत पक्का हवय, जिनगी के सौगात गा।

काठी के नेवता अपन, मैं हा आज पठोत हंव।
जरहूं सब ला देख के , सपना अपन सजोत हंव ।।

छोड़ नशा पानी के चक्कर

छोड़ नशा पानी के चक्कर, नशा नाश के जड़ हे ।
माखुर बिड़ी दारू गांजा के, नुकसानी अड़बड़ हे ।।

रिकिम-रिकिम के रोगे-राई, नशा देह मा बोथे ।
मानय नही जेन बेरा मा, पाछू मुड़ धर रोथे ।।
उठ छैमसी निंद ले जल्दी, अपने आंखी खोलव ।
सोच समझ के पानी धरके, अपने मुॅह ला धोलव ।।
नही त टूट जही रे संगी, जतका तोर अकड़ हे ।
छोड़ नशा पानी के चक्कर, नशा नाश के जड़ हे ।

धन जाही अउ धरम नशाही, देह खाख हो जाही ।
मन बउराही बइहा बानी, कोने तोला भाही ।
संगी साथी छोड़ भगाही, तोर कुकुर गति करके ।
जादा होही घर पहुॅंचाही, मुरदा जइसे धरके ।।
तोर हाथ ले छूट जही रे, जतका तोर पकड़ हे ।
छोड़ नशा पानी के चक्कर, नशा नाश के जड़ हे ।

छेरी पठरू जइसे तैं हर, चाबत रहिथस गुटका।
गांजा के भरे चिलम धर के, मारत रहिथस हुक्का ।
फुकुर-फुकुर तैं बिड़ी सिजर के, लेवत रहिथस कस ला ।
देशी महुॅवा दारू विदेशी, चुहकत रहिथस रस ला ।।
कभू नई तो सोचे तैं हर,  ये लत हा गड़बड़ हे ।
छोड़ नशा पानी के चक्कर, नशा नाश के जड़ हे ।

बुधवार, 22 जून 2016

दोहावली

जीयत भर खाये हवन, अपन देश के नून ।
छूटे बर कर्जा अपन, दांव लगाबो खून ।।

जीवन चक्का जाम हे, डार हॅसी के तेल ।
सुख-दुख हे दिन रात कस, हॅसी-खुशी ले झेल ।।

चल ना गोई खाय बर, चुर गे हे ना भात ।
रांधे हंव मैं मुनगा बरी, जेला तैं हा खात ।।

महर महर ममहात हे, चुरे राहेर दार ।
खाव पेट भर भात जी, घीव दार मा डार ।।

परोसीन हा पूछथे, रांधे हस का साग ।
हमर गांव के ये चलन, रखे मया ला पाग ।।

दाई ढाकय मुड़ अपन, देखत अपने जेठ ।
धरे हवय संस्कार ला, हे देहाती ठेठ ।।

खेती-पाती बीजहा, लेवव संगी काढ़ ।
करिया बादर छाय हे, आगे हवय असाढ़ ।।

बइठे पानी तीर मा, टेर करय भिंदोल ।
अगन-मगन बरसात मा, बोलय अंतस खोल ।।

बइला नांगर फांद के, जोतय किसान खेत ।
टुकना मा धर बीजहा,  बावत करय सचेत ।।

मुंधरहा ले जाग के, जावय खेत किसान ।
हॅसी-खुशी बावत करत, छिछत हवय गा धान ।।

झम झम बिजली हा करय, करिया बादर घूप ।
कारी चुन्दी बगराय हे, धरे परी के रूप ।।

आज काल के छोकरा, एती तेती ताक ।
अपन गांव परिवार के, काट खाय हे नाक ।।

मोरे बेटा कोढ़िया, घूमत मारय शान ।
काम-बुता के गोठ ला, एको धरय न कान ।।

जानय न घाम थोरको, बइठे रहिथे छाॅंव ।
बेटा मोर किसान के, खेत धरय ना पाॅंव ।।

चल चल बेटा खेत मा, देबे मोला साथ ।
बुता सिखा हूॅं आज मैं, धर के तोरे हाथ ।।

गुरुवार, 9 जून 2016

करिया बादर (घनाक्षरी छंद)

करिया करिया घटा, उमड़त घुमड़त
बिलवा बनवारी के, रूप देखावत हे ।
सरर-सरर हवा, चारो कोती झूम झूम,
मन मोहना के हॅसी, ला बगरावत  हे ।
चम चम चमकत, घेरी बेरी बिजली हा,
हाॅसत ठाड़े कृश्णा के, मुॅह देखावत हे ।
घड़र-घड़र कर, कारी कारी बदरी हा,
मोहना के मुख परे, बंषी सुनावत हे ।

सोमवार, 6 जून 2016

सुमुखी सवैया


मया बिन ये जिनगी मछरी जइसे तड़पे दिन रात गियां ।
मया बिन ये तन हा लगथे जइसे ठुड़गा रूख ठाड़ गियां।।
मया बरखा बन के बरसे तब ये मन नाचय मोर गियां ।
मया अब सावन के बरखा अउ राज बसंत बयार गियां


शुक्रवार, 3 जून 2016

का करबे आखर ला जान के

का करबे आखर ला जान के
का करबे दुनिया पहिचान के ।

घर के पोथी धुर्रा खात हे,
पढ़थस तैं अंग्रेजीस्तान के ।

मिलथे शिक्षा ले संस्कार हा,
देखव हे का हिन्दूस्तान के ।

सपना देखे मिल जय नौकरी
चिंता छोड़े निज पहिचान के ।

पइसा के डारा मा तैं चढ़े
ले ना संदेशा खलिहान के

जाती-पाती हा आरक्षण बर
शादी बर देखे ना छान के ।

मुॅह मा आने अंतस आन हे
कोने जानय करतब ज्ञान के ।

गुरुवार, 2 जून 2016

बेटी ला शिक्षा संस्कार दौ

गजल
बहर-222, 222, 212

बेटी ला शिक्षा संस्कार दौ ।
जिनगी जीये के अधिकार दौ ।।

बेटी होथे बोझा जे कहे,
मन के ये सोचे ला टार दौ ।

दुनिया होथे जेखर गर्भ ले,
अइसन नोनी ला उपहार दौ ।

मन भर के उड़ लय आकाश मा,
ओखर डेना पांखी झार दौ ।

बेटी के बैरी कोने हवे,
पहिचानय अइसन अंगार दौ ।

बैरी मानय मत ससुरार ला
अतका जादा ओला प्यार दौ ।

टोरय मत फइका मरजाद के,
अइसन बेटी ला आधार दौ ।

ताना बाना हर परिवार के,
बाचय अइसन के संस्कार दौ ।