गुरुवार, 23 जून 2016

छोड़ नशा पानी के चक्कर

छोड़ नशा पानी के चक्कर, नशा नाश के जड़ हे ।
माखुर बिड़ी दारू गांजा के, नुकसानी अड़बड़ हे ।।

रिकिम-रिकिम के रोगे-राई, नशा देह मा बोथे ।
मानय नही जेन बेरा मा, पाछू मुड़ धर रोथे ।।
उठ छैमसी निंद ले जल्दी, अपने आंखी खोलव ।
सोच समझ के पानी धरके, अपने मुॅह ला धोलव ।।
नही त टूट जही रे संगी, जतका तोर अकड़ हे ।
छोड़ नशा पानी के चक्कर, नशा नाश के जड़ हे ।

धन जाही अउ धरम नशाही, देह खाख हो जाही ।
मन बउराही बइहा बानी, कोने तोला भाही ।
संगी साथी छोड़ भगाही, तोर कुकुर गति करके ।
जादा होही घर पहुॅंचाही, मुरदा जइसे धरके ।।
तोर हाथ ले छूट जही रे, जतका तोर पकड़ हे ।
छोड़ नशा पानी के चक्कर, नशा नाश के जड़ हे ।

छेरी पठरू जइसे तैं हर, चाबत रहिथस गुटका।
गांजा के भरे चिलम धर के, मारत रहिथस हुक्का ।
फुकुर-फुकुर तैं बिड़ी सिजर के, लेवत रहिथस कस ला ।
देशी महुॅवा दारू विदेशी, चुहकत रहिथस रस ला ।।
कभू नई तो सोचे तैं हर,  ये लत हा गड़बड़ हे ।
छोड़ नशा पानी के चक्कर, नशा नाश के जड़ हे ।