गुरुवार, 23 जून 2016

काठी के नेवता

कोने जानय जिंनगी, जाही कतक दूर तक ।
बेरा उत्ते बुड़ जही, के ये जाही नूर तक ।।

टुकना तोपत ले जिये, कोनो कोनो डोकरी ।
मोला आये ना समझ, कइसे मरगे छोकरी ।।

अभी अभी तो जेन हा, करत रहिस हे बात गा ।
हाथ करेजा मा धरे, सुते लमाये लात गा ।।

रेंगत रेंगत छूट गे, डहर म ओखर प्राण गा ।
सजे धजे मटकत रहिस, मारत जे हा शान गा ।।

देख देख ये बात ला, मैं हा सोचंव बात गा।
मोर मौत पक्का हवय, जिनगी के सौगात गा।

काठी के नेवता अपन, मैं हा आज पठोत हंव।
जरहूं सब ला देख के , सपना अपन सजोत हंव ।।