शनिवार, 30 जुलाई 2016

मोर गांव हे सुख्खा

चारो कोती पूरा पानी, मोर गांव हे सुख्खा ।
सबके मरकी भरे भरे हे, मोरे मरकी दुच्छा।।

खेत खार के गोठ छोड़ दे, मरत हवन पीये बर ।
पानी पानी बर तरसत हन, घिर्रत हन जीये बर ।।

नरवा तरिया सुख्खा हावे, सब्बो कुॅआ पटागे ।
हेण्ड़ पम्प मोटर सुते हवय, जम्मो बोर अटागे ।।

घर के बाहिर जे ना जाने, भरत हवय ओ पानी ।
पानी टैंकर जोहत रहिथे, मोरे घर के रानी ।।

धुर्रा गली उड़ावत हावे, सावन के ये महिना ।
घाम जेठ जइसे लागे हे, मुड़ धर के सहिना ।।

काबर गुस्साये हे बादर, लइका कस ललचाथे ।
कभू टिपिर टापर नई करय, बस आथे अउ जाथे ।।

सोचव सोचव जुरमिल सोचव, काबर अइसन होथे ।
काबर सावन भादो महिना, घाम उमस ला बोथे ।।

बेजाकब्जा चारो कोती, रूख राई ला काटे ।
परिया चरिया घेरे हावस, कुॅआ बावली पाटे ।।

भरे हवय लालच के हण्ड़ा, पानी मांगे काबर ।
अपन अपन अब हण्ड़ा फोरव,  लेके हाथे साबर ।।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

हरेली

सुख के बीजा बिरवा होके, संसो फिकर ल मेटय ।
धनहा डोली हरियर हरियर, मनखे मन जब देखय ।।

धरती दाई रूप सजावय, जब आये चउमासा ।
हरियर हरियर चारो कोती, बगरावत हे आसा ।।

सावन अम्मावस हा लावय, अपने संग हरेली ।
हॅसी खुशी ला बांटत हावय, घर घर मा बरपेली ।

कुदरी रपली हॅसिया नागर, खेती के हथियारे ।
आज देव धामी कस होये, हमरे भाग सवारे ।।

नोनी बाबू गेड़ी मच-मच, कूद-कूद के नाचय ।।
बबा खोर मा बइठे बइठे, देख देख के हाॅसय ।।

सोमवार, 25 जुलाई 2016

बरस बरस ओ बरखा रानी

धान पान के सुघ्घर बिरवा, लइका जस हरषाावय ।
जब सावन के बरखा दाई, गोरस अपन पियावय ।

ठुमुक ठुमुक लइका कस रेंगय, धान पान के बिरवा ।
लहर लहर हवा संग खेलय, जइसे लइका हिरवा ।।

खेत खार हे हरियर हरियर, हरियर हरियर परिया ।
झरर झरर जब बरसे पानी, भरे लबालब तरिया ।।

नदिया नरवा छमछम नाचय, गीत मेचका गावय ।
राग झिुंगुरा छेड़े हावय, रूखवा ताल मिलावय ।।

भरे भरे हे बारी बखरी, नार बियारे छाये ।
तुमा कोहड़ा छानही चढ़य, भाजी पाला लाये ।।

जानय नही महल वाले हा, कइसे गिरते पानी ।
गरीबहा मन के जिनगी के, कइसन राम कहानी ।।

घात डहे हवय बेंदरा हा, परवा खपरा फोरे ।
कूद कूद के नाचत रहिथे, कभू न रेंगे कोरे ।।

झरे ओरवाती झिमिर झिमिर, घर कुरिया बड़ चूहे ।
हवय गाय कोठा मा पानी, तभो पहटिया दूहे ।।

परछी अॅंगना एके लागे, ओधे भले झिपारी ।
घर कुरिया हे तरई आंजन, सिढ़ ले परे किनारी ।।

मन के पीरा मन मा राखे, गावय गीत ददरिया ।
बरस बरस ओ बरखा रानी, बरसव बादर करिया ।।

दाई परसे मेघा बरसे, तभे पेट हा भरथे ।
कभू कहूं ओ गुस्सा होवय, सबके जियरा जरथे ।।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

मनखे ओही बन जाथे

कुकुभ छंद
जेन पेड़ के जर हे सुध्घर, ओही पेड़ ह लहराथे।
जर मा पानी डारे ले तो, डारा पाना हरियाथे ।।

नेह पोठ होथे जे घर के, ओही घर बहुत खटाथे ।
उथही होय म नदिया तरिया, मांघे फागुन म अटाथे ।।

ढेला पथरा ला ठोके मा, राईं-झाईं हो जाथे ।
कच्चा माटी के लोंदा ले, करसी मरकी बन जाथे ।

जेन पेड़ ठांढ़ खड़े रहिथे, झोखा पाये गिर जाथे ।
लहर लहर हवा संग करके, नान्हे झांड़ी इतराथे ।।

करू कस्सा कस बोली बतरस, जहर महूरा कस होथे ।
मीठ गोठ के बोली भाखा, सिरतुन अमरित रस बोथे।

जिहां चार ठन भड़वा बरतन, धोये मांजे मा चिल्लाथे ।
संगे जुरमिल एक होय के, रंधहनी कुरिया मा जाथे ।।

जेन खेत के मेढ़ साफ हे, ओही हा खेत कहाथे ।
मनखे ला जे मनखे मानय, मनखे ओही बन जाथे ।।

कब तक हम सब झेलत रहिबो

कब तक हम सब झेलत रहिबो, बिखहर सांप गला लपेट ।
कभू जैष अलकायदा कभू, कभू नवा इस्लामिक स्टेट ।।

मार काट करना हे जेखर, धरम करम तो केवल एक ।
गोला बारूद बंदूक धरे, सबके रसता राखे छेक ।।

मनखे मनखे जेती देखय, गोला बारूद देथे फोड़ ।
अपन जुनुन मा बइहा होके, उधम मचावत हें घनघोर ।।

चिख पुकार अउ रोना धोना, मचे हवय गा हाहाकार ।
बिना मौत कतको मरत हंवय, देखव इन्खर अत्याचार ।।

नाम धरम के बदनाम करत, खेले केवल खूनी खेल ।
मनखे होके राक्षस होगे, मनखेपन ला घुरवा मेल ।।

रविवार, 17 जुलाई 2016

पढ़ई के नेह

होथे गा पढ़ई जिहां, काबर चूरे भात ।
पढ़ई लिखई छोड़ के, करे खाय के बात ।

बस्ता मा थारी हवय, लइका जाये स्कूल ।
गुरूजी के का काम हे, रंधवाय म मसगूल ।।

मन हा तो काहीं रहय, बने रहय गा देह ।
बने रहय बस हाजरी, येही पढ़ई के नेह ।।

अइसन शिक्षा नीति हे, काला हे परवाह ।
राजनीति के फेर मा, करत हें वाह-वाह ।।

प्रायवेट वो स्कूल मा, कतका लूट-घसोट ।
गुरूजी हे पातर दुबर, कोन धरे हे नोट ।।

करथें केवल चोचला, आन देश के देख ।
अपन देश के का हवय, पढ़व आन के लेख ।

हवय कमई जेखरे, पढ़ई म देत फूक ।
छोड़-छाड़ संस्कार ला, देखय केवल ‘लूक‘ ।
-रमेश चैहान

रविवार, 10 जुलाई 2016

राग द्वेष ला छोड़ दे

राग द्वेष ला छोड़ दे, जेन नरक के राह ।
कोनो ला खुश देख के, मन मा मत भर आह ।।

त्याग प्रेम के हे परख, करव प्रेम मा त्याग ।
स्वार्थ मोह के रंग ले, रंगव मत अनुराग ।।

जनम जनम के पुण्य ले, पाये मनखे देह ।
करले ये जीवन सफल, मनखे ले कर नेह ।।

अमर होय ना देह हा, अमर हवे बस जीव ।
करे करम जब देह हा, होय तभे संजीव ।।

रोक छेक मन हा करय, पूरा करत मुराद ।
मजा मजा बस खोज के, करय बखत बरबाद ।।

नोनी बाबू एक हे

चंडिका छंद 13 मात्रा पदांत 212

नोनी बाबू एक हे । नारा हा बड़ नेक हे
करके जग के काम ला । नोनी करथे नाम ला

काम होय छोटे बड़े । हर काम म नोनी अड़े
घर अउ बाहिर के बुता । नोनी हा देथे़ कुता

येमा का परहेज हे । नोनी खुदे दहेज हे
नोनी ला बड़ मान दौ । आघू ओला आन दौ

नोनी नोनी के षोर मा । नवा चलन के जाोर मा
बाबू मन पछुवाय हे । नोनी मन अघुवाय हे

बाबू होगे छोट रे । जइसे सिक्का खोट रे
नोनी बहुते हे पढ़े । बाबू बहुते हे कढ़े

ताना बाना देश के । हर समाज परिवेश के
तार तार झन होय गा । सोचव मन धोय गा

शनिवार, 9 जुलाई 2016

कहमुकरिया

1.
मोरे कान जेन हा धरथे।
आॅंखी उघार उज्जर करथे ।।
दुनिया देखा करे करिश्मा ।
का सखि ?
जोही ।
नहि रे चश्मा ।

2.
बइला भइसा जेखर संगी ।
खेत जोत जे करे मतंगी ।
काम करे ले थके न जांगर ।
का सखी ?
किसान
नही रे, नांगर ।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

बरसात

चढ़ बादर के पीठ मा, बरसत हवय असाढ़ ।
धरती के सिंगार हा, अब तो गे हे बाढ़ ।।

रद-रद-रद बरसत हवय, घर कुरिया सम्हार ।
बांध झिपारी टांग दे, मारत हवय झिपार ।।

चिखला हे तोरे गोड़ मा, धोके आना गोड़ ।
चिला फरा घर मा बने, खाव पालथी मोड़ ।।

सिटिर सिटिर सावन करय, झिमिर झिमिर बरसात ।
हरियर लुगरा ला पहिर, धरती गे हे मात ।।