शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

मनखे ओही बन जाथे

कुकुभ छंद
जेन पेड़ के जर हे सुध्घर, ओही पेड़ ह लहराथे।
जर मा पानी डारे ले तो, डारा पाना हरियाथे ।।

नेह पोठ होथे जे घर के, ओही घर बहुत खटाथे ।
उथही होय म नदिया तरिया, मांघे फागुन म अटाथे ।।

ढेला पथरा ला ठोके मा, राईं-झाईं हो जाथे ।
कच्चा माटी के लोंदा ले, करसी मरकी बन जाथे ।

जेन पेड़ ठांढ़ खड़े रहिथे, झोखा पाये गिर जाथे ।
लहर लहर हवा संग करके, नान्हे झांड़ी इतराथे ।।

करू कस्सा कस बोली बतरस, जहर महूरा कस होथे ।
मीठ गोठ के बोली भाखा, सिरतुन अमरित रस बोथे।

जिहां चार ठन भड़वा बरतन, धोये मांजे मा चिल्लाथे ।
संगे जुरमिल एक होय के, रंधहनी कुरिया मा जाथे ।।

जेन खेत के मेढ़ साफ हे, ओही हा खेत कहाथे ।
मनखे ला जे मनखे मानय, मनखे ओही बन जाथे ।।