रविवार, 11 सितंबर 2016

ये बरखा रानी विनती सुनलव

ये बरखा रानी, सुनव कहानी, मोर जुबानी, ध्यान धरे ।
तोरे बिन मनखे, रहय न तनके, खाय न मनके, भूख मरे ।।
बड़ चिंता करथें, सोच म मरथे, देखत जरथे, खेत जरे ।
कइसे के जीबो, काला पीबो, बूंद न एको, तोर परे ।।

थोकिन तो गुनलव, विनती सुनलव, बरसव रद्-रद्, एक घड़ी ।
मानव तुम कहना, फाटे धनहा, खेत खार के, जोड़ कड़ी ।।
तरिया हे सुख्खा, बोर ह दुच्छा, बूंद-बूंद ना, हाथ धरे ।
सुन बरखा दाई, करव सहाई, तोर बिना सब, जीव मरे ।।