शनिवार, 10 सितंबर 2016

रदिफ, काफिया,बहर

221/ 222/ 212/ 2222
आखिर म घेरी-बेरी जउन आखर आथे ।
ओ हा गजल मुक्तक के रदिफ तो बन जाथे ।
तुक काफिया हा होथे रदिफ के आघू मा,
एके असन मात्रा क्रम बहर बन इतराथे  ।
-रमेश चौहान