बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

मउत

मउत ह
करिया बादर बन
चौबीस घंटा छाये हे

कभू सावन के बादर बन
खेत खार ला हरियावय
फल-फूल अन्न-धन्न  उपजाके
जीव-जीव ला सिरजावय

कभू-कभू
गाज बनके
आगी ल बरसाये हे

ओही बादर ला देख
मनखे झूमय नाचय
आगी कस दहकत घाम ले
मनखे-मनखे बाचय

गुस्सा मा
जब बादर फाटय
पर्वत घला बोहाये हे

एक बूँद बरसे न जब बादर
चारो कोती हाहाकार मचे हे
सृष्टि के हर अनमोल रचना
ये चक्कर ले कहां बचे हे

आवत-जावत
करिया बादर
सब ला नाच नचाये हे