बुधवार, 2 नवंबर 2016

ऊही ठउर ह घर कहाथे (नवगीत)

झरर-झरर चलत रहिथे
जिहां मया के पुरवाही
ऊही ठउर ह घर कहाथे

ओदरे भले हे छबना
फुटहा भिथिया के
लाज ला ढाके हे
परदा रहेटिया के

लइका खेलत रहिथे
मारत किलकारी
ओही अँगना गजब सुहाथे
अपन मुँह के कौरा ला
लइका ला खवावय
अपन कुरथा ला छोड़
ओखर बर जिन्स लावय

पाई-पाई जोरे बर
जांगर ला पेर-पेर
ददा पसीना मा नहाथे

अभी-अभी खेत ले
कमा के आये हे बहू
ताकत रहिस बेटवा
अब चुहकत हे लहू

लांघन-भूखन सहिथे
लइका ला पीयाय बिन
दाई हा खुदे कहां खाथे

माटी, ईटा-पथरा के
पोर-पोर मा मया घुरे हे
माई पिल्ला के पसीना मा
लत-फत ले मया हा चुरे हे

खड़ा होथे जब अइसन
घर-कुरिया के भथिया
तभे सब मा मया पिरोथे