सोमवार, 26 दिसंबर 2016

मया के सुरता

उत्ती के बेरा जइसे
सुरता तोरे जागे हे

मन के पसरे बादर म
सोना कस चमकत हे
मोरे काया के धरती म
अंग-अंग चहकत हे

दरस-परस के सपना मा
डेना-पांखी लागे हे

सुरता के खरे मझनिया
देह लकलक ले तिपे हे
अंतस के धीर अटावत
मया तोरे लिपे हे

अंग-अंग म अगन लगे
काया म मन छागे हे

तोर हंसी के पुरवाही
सुरता म जब बोहाय
आँखी के बोली बतरस
संझा जइसे जनाय

आँखी म आँखी के समाये
आँखी म रतिहा आगे हे