शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

मैं तो बेटी के बाप

//नवगीत//
दुख के हाथी मुड़ मा बइठे
कइसे बिताववं रात

टुकुर-टुकुर बादर ला देखत
ढलगे हवं चुपचाप
न रोग-राई हे न प्रेम रोग हे
मैं तो बेटी के बाप

कोन सुनही काला सुनावंव
अपन मन के बात

जतका मोरे चद्दर रहिस हे
ततका पांव मारेंव
चिरई कस चुन-चुन दाना
ओखर मुह मा डारेंव

बेटी-बेटा एक मान के
पढाय लिखाय हंव घात

कइसे कहंव अपन पीरा ल
मिलय न लइका अइसे
पढ़े-लिखे गुणवान होय
मोरे नोनी हे जइसे

पढ़ई-लिखई छोड़-छोड़ के
टुरा दारू म गे मात

जांवर-जीयर बिन बिरथा हे
नोनी के बुता काम
दूनो चक्का एक होय म
चलथे गाड़ी तमाम

आंगा-भारू कइसे फांदवं
लाके कोनो बरात

टूरा अउ टूरा के ददा
थोकिन गुनव सोचव
पढ़ई लिखई पूरा करके
काम बुता सरीखव

नोनी बाबू एक बरोबर
बाढ़त रहल दिन रात


-रमेश चौहान