शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

चल चिरईया नवा बसेरा

//चौपाई छंद//
चल चिरईया नवा बसेरा । अपन करम ला धरे पसेरा
पर ला अब अपने हे करना । मया प्रीत ला ओली भरना

कइसे सपना देखव आँखी । मइके मा बंधे हे पाँखी
रीत जगत के एके हावय । मइके छोड़े ससुरे भावय

मोर भाग हा ओखर हाथ म । जीना मरना जेखर साथ म
दाना-पानी संगे खाबो । अपन खोंधरा हम सिरजाबो

सास-ससुर हा देवी-देवा । मंदिर जइसे करबो सेवा
दूनों हाथ म बजही ताली । नो हय ये हा सपना खाली

धुरी सृष्टि के जेला कहिथे । जेखर बर सब जीथे मरथे
मृत्यु लोक के हम चिरईया । सुख-दुख के केवल सहईया