बुधवार, 19 अप्रैल 2017

चना होरा कस, लइकापन लेसागे

चना होरा कस,
लइकापन लेसागे

पेट भीतर लइका के संचरे
ओखर बर कोठा खोजत हे,
पढ़ई-लिखई के चोचला धर
स्कूल-हास्टल म बोजत हे

देखा-देखी के चलन
दाई-ददा बउरागे

सुत उठ के बड़े बिहनिया
स्कूल मोटर म बइठे
बेरा बुड़ती घर पहुॅचे लइका
भूख-पियास म अइठे

अंग्रेजी चलन के दौरी म
लइका मन मिंजागे

बारो महिना चौबीस घंटा
लइका के पाछू परे हे
खाना-पीना खेल-कूद सब
अंग्रेजी पुस्तक म भरे हे

पीठ म लदका के परे
बछवा ह बइला कहागे

चिरई-चिरगुन, नदिया-नरवा
अउ गाँव के मनखे
लइका केवल फोटू म देखे
सउहे देखे न तनके

अपने गाँव के जनमे लइका
सगा-पहुना कस लागे

साहेब-सुहबा, डॉक्टर-मास्टर
हो जाही मोर लइका
जइसने बड़का नौकरी होही
तइसने रौबदारी के फइका

पुस्तक के किरा बिलबिलावत
देष-राज म समागे

बंद कमरा म बइठे-बइठे साहब
योजना अपने गढ़थे
घाम-पसीना जीयत भर न जाने
पसीना के रंग भरथे

भुईंया के चिखला जाने न जेन
सहेब बन के आगे