सोमवार, 19 जून 2017

सभ्य बने के चक्कर मा

लइका दाई के दूध पिये, दाई-दाई चिल्लाथे ।
आया डब्बा के दूध पिये, अपने दाई बिसराथे।।

जेने दाई अपने लइका, गोरस ला नई पियाये।
घेरी-घेरी लालत ओला, जेने ये मान गिराये ।।

सभ्य बने के चक्कर मा जे, अपन करेजा बिसराये ।
बोलव दुनिया वाले कइसे, ओही हा सम्य कहाये ।।

दाई के गोरस कस होथे, देश राज के भाखा ।
पर के भाखा ओदर जाही, जइसे के छबना पाखा ।।

म्याऊ-म्याऊ बोल-बोल के,  बिलई बनय नही तोता।
छेरी पठरू संग रही के, बघवा होय नही थोथा ।।

अपने गोरस अपने भाखा, अपने लइका ला दे दौ ।
देखा-सेखी छोड़-छाड़ के, संस्कारी बीजा बो दौ ।