शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

मोर सपना के भारत

मोरे सपना के भारत मा, हर हाथ म हे काम ।
जाति-धर्म के बंधन तोड़े, मनखे एक समान ।।

लूट-छूट के रीति नई हे, सब बर एके दाम ।
नेता होवय के मतदाता, होवय लक्ष्मण राम ।।

प्रांत-प्रांत के सीमा बोली, खिचय न एको डाड़ ।
नदिया जस सागर मिलय, करय न चिटुक बिगाड़ ।।

भले करय सत्ता के निंदा, छूट रहय हर हाल ।
फेर देश ला गारी देवय, निछब ओखरे खाल ।।

जेन देश के चिंता छोड़े, अपने करय विचार ।
मांगय झन अइसन मनखे, अपन मूल अधिकार ।।

न्याय तंत्र होय सरल सीधा, मेटे हर जंजाल ।
लूटय झन कोनो निर्धन के, खून पसीना माल ।।

लोकतंत्र के परिभाषा ला, सिरतुन करबो पोठ ।
वोट होय आधा ले जादा, तभे करय ओ गोठ ।।

संविधान के आत्मा जागय, रहय धर्म निरपेक्ष ।
आंगा भारू रहय न कोनो, टूटय सब सापेक्ष ।।

मौला पंड़ित मानय मत अब, नेता अउ सरकार ।
धरम-करम होवय केवल, जनता के अधिकार ।

देश प्रेम धर्म बड़े सबले, सब बर जरूरी होय ।
देश धर्म ला जे ना मानय, देश निकाला होय ।।