शनिवार, 15 जुलाई 2017

बदरा, मोरे अँगना कब आबे

जोहत-जोहत रद्दा तोरे, आँखी मोरे पथरागे ।
दुनिया भर मा घूमत हस तैं, मोरे अँगना कब आबे ।

ओ अषाढ़ के जोहत-जोहत, आसो के सावन आगे ।
नदिया-तरिया सुख्खा-सुख्खा, अउ धरती घला अटागे ।

रिबी-रिबी लइका मन होवय, बोरिंग तीर मा जाके ।
घेरी- घेरी दाई उन्खर, सरकारी नल ला झाके ।

बूंद-बूंद पानी बर बदरा, बन चातक तोला ताके ।
थूकव बैरी गुस्सा अपने, अब बरसव रंग जमाके ।।

खेत-खार हा सुख्खा-सुख्खा, नांगर बइला बउरागे ।
धान-पान के बाते छोड़व, कांदी-कचरा ना जागे ।।

आन भरोसा कब तक जीबो, करजा-बोड़ी ला लाके ।
पर घर के चाउर भाजी ला, हड़िया चूल्हा हा झाके ।

चाल-ढ़ाल ला तोरे देखत, चिरई-चिरगुन तक हापे ।
गुजर-बसर अब कइसे होही, तन-मन हा मोरो कापे ।।

जीवन सब ला देथस बदरा, काल असन काबर झाके ।
थूकव बैरी गुस्सा अपने, अब बरसव रंग जमाके ।।