रविवार, 16 जुलाई 2017

ढल देश के हर ढंग मा

चल संग मा चल संग मा, ढल देश के हर ढंग मा ।
धरती जिहां जननी हवे, सुख बांटथे हर रंग मा ।।
मनका सबो गर माल के, सब एक हो धर के मया ।
मनखे सही मनखे सबो, कर लौ बने मनखे दया ।।
भटके कहां घर छोड़ के, धर बात ला तैं आन के ।
सपना गढ़े हस नाश के, बड़ शत्रु हमला मान के ।।
हम संग मा हर पाँव मा, मिल रेंगबो हर हाल मा ।
घर वापसी कर ले अभी, अब रेंग ले भल चाल मा ।।
अकड़े कहूं अब थोरको, सुन कान तैं अब खोल के ।
बचबे नहीं जग घूम के, अब शत्रु कस कुछु बोल के ।।
कुशियार कस हम फाकबो, हसिया धरे अब हाथ मा ।
कांदी लुये कस बूचबो, अउ लेसबो अब साथ मा ।।