शनिवार, 24 मार्च 2018

भभकत आगी ला जल्दी ले बुतोवव

छत्तीस प्रकार सोच धरे
छत्तीस प्रकार के मनखे
छत्तीसगढ़ के संगे-संग
हमर देश मा रहिथे
जइसे कोनो फूल के माला मा
रिकिम-रिकिम के फूल
एक संग गुथाये होवय ।

हमर देश के छाती हा
घातेच चाकर हे
जेमा समा जाथे
आनी-बानी के
भाशा-बोली
अउ
आनी-बानी के
सोच वाले मनखे ।

फेर अभी-अभी
धुँवा आवत हे
आगी सुलगत हे
भीतर-बाहिर
अपन-बिरान
तोर-मोर
के कचरा मा
कोनो लुकी डार दे हे ।

दउड़व-दउड़व
अपन सोच-विचार के
हउला-डेचकी धर के
समता के पानी भर के
भभकत आगी ला
जल्दी ले बुतोवव ।

भगतन, श्रद्धा ला चढ़ात हे

एती-तेती चारो कोती, ढोलक मादर संग,
मंदिर-मंदिर द्वारे-द्वारे, जस हा सुनात हे ।
चुन्दी छरियाये झूपे, कोनो बगियाये झूपे,
कोनो-कोनो साट बर, हाथ ला लमात हे ।।
दाई के भगत सबो, डंडासरन गिरय
अपन-अपन दुख, दाई ला सुनात हे ।
फूल-पान नरियर, चुरी-फिता लुगरा,
संगे-संग भगतन, श्रद्धा ला चढ़ात हे ।।


मंगलवार, 6 मार्च 2018

‘‘गांव ले लहुटत-लहुटत‘

श्री केदारनाथ अग्रवाल के कविता ‘चन्द्रगहना से लौटती बेर‘ के आधार मा छत्तीसगढ़ी कविता -

‘‘गांव ले लहुटत-लहुटत‘

देख आयेंव मैं गांव
अब देखत हँव अपन चारो कोती
खेत के मेढ़ मा बइठे-बइठे
बीता भर बठवा चना
मुड़ मा पागा बांधे
छोटे-छोटे गुलाबी फूल के
सजे-धजे खड़े हे ।
संगे-संगे खड़े हे
बीच-बीच मा
अरसी पातर-दुबर
कनिहा ला डोलावत
मुड़ी मा नीला-नीला फूल
कहत हे कोनो तो मोला
छुवय
कोनो तो मोला देखय
मन भर
अपन सरबस दान कर देहूॅ ।
सरसों के झन पूछ
एकदम सियान होगे हे
हाथ पीला करके
बिहाव मड़वा मा
फाग गावत फागुन
आगे हे तइसे लगथे ।
अइसे लगत हे जानो-मानो
कोनो स्वयंबर चलत हे
प्रकृति के मया के अचरा डोलत हे
सुन-सान ये खेत मा
षहर-पहर से दूरिहा
मया के मयारू भुईंया
कतका सुग्घर हे ।

गोड़ तरी हे तरिया
जेमा लहरा
घेरी-बेरी आवत जावत हे
अउ लहरावत हे
पानी तरी जागे
कांदी कचरा
एक चांदी के बड़का असन खम्भा
आँखी मा चकमकावत हे ।
तीरे-तीरे कतका कन पथरा
चुपे-चुप पानी पीयत हे
कोन जनी पियास कब बुछाही ।

चुप-चाप खड़े कोकड़ा
आधा गोड़ पानी मा डारे
एती-तेती जावत मछरी ला
देखते ध्यान छोड़
झट कन चोंच मा दबा के
टोटा तरी गटक लेथे ।

एक करिया माथा वाले चिरई
चतुर चालाक
झप्पटा मार के
पानी के करेजा मा
तउड़त सादा-सादा मछरी
अपन पीयर-पीयर चोंच मा दबा के
उड़ा जथे दूरिहा बादर मा ।

अब अही मेर ले
भुईंया ऊंचा होय हे जेन मेर ले
रेल के पटरी गे हे
ट्रेन के टाइम नई हे
मैं मनमौजी मस्त हँव
जाना नई हे ।
चित्रकूट के जतर-कतर चौड़ाई
छोटे-छोटे पहाड़ी
चारो-कोती फइले हे
बंजर भुईंया मा
एती-तेती बम्हरी के पेड़
कांटा वाले
जेखर रंग ना रूप
खड़े हे ।

सुनावत हे
मीठ-मीठ रस चुचवावत
झींगुरा के बोली-बतरस
झीं-झीं-झीं-झीं
सुनावत हे
जंगल के छाती चीरत
स्वर मा उतरत-चढ़त
सारस के गीत
मन करथे
उड़ जँव
पाखी फइला के सारस संग
जिहां जुगुल जोड़ी रहिथे
हरियर-हरियर खेत मा
अउ मया के सुन लँव गीत
चुपे-चुप ।

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

छत्तीसगढ़ी श्लोक (अनुष्टुप छंद)


1.
दुनिया ला बनाये तैं, कहाये भगवान गा ।
दुनिया ला चलाये तैं, मनखे बदनाम गा ।।
2.
पत्ता डोलय ना एको, मरजी बिन तोर तो ।
अपन मन के धुर्रा, उड़ावय न थोरको ।।
3.
तहीं हवस काया के, सब मा एक प्राण गा ।
तहीं हवस माया के, अकेल्ला सुजान गा ।।
4.
सबकुछ ह तो तोरे, हमर एक तो तहीं ।
तैं पतंग के डोरी, हम पतंग के सहीं ।।
5.
सब मा तोर माया हे, तोला जउन भात हे ।
कहां हमर ये बेरा, कुछु अवकात हे ।।
6.
मनखे मनखे माने, मनखे मनखे सबो ।
मनखेपन के देदे, प्रभु तैं वरदान गो ।।