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रमेशकुमार सिंह चौहान के छत्तीसगढ़ी काव्यांजली:- सुरता rkdevendra.blogspot.com

छोड़ दारु के फेशन

छोड़ दारु के फेशन, हे बड़ नुकसान ।
फेशन के चक्कर मा, हस तैं अनजान ।।

नशा नाश के जड़ हे, तन मन ला खाय ।
कोन नई जानय ये, हे सब भरमाय ।।

दारु नशा ले जादा, फेशन हे आज ।
पढ़े-लिखे अनपढ़ बन, करथे ये काज।।

कोन धनी अउ निर्धन, सब एके हाल ।
मनखे-मनखे चलथे, दरुहा के चाल ।।

नीत-रीत देखे मा, दोषी सरकार ।
चाल-चलन मनखे के, रखय न दरकार ।।

-रमेश चौहान

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