शनिवार, 31 जनवरी 2015

फोकट मा

फोकट मा कुछु पाय बर, हे खड़े एक गोड़ ।
स्वाभिमान ला बेच के, बइठे माड़ी मोड़ ।।
बइठे माड़ी मोड़, चहेटय आनी बानी ।
अपन आप ला बेच, करव मत ग सियानी ।।
नेता अउ सरकार, नाक रगड़े हे चैखट मा ।
स्वाभिमान हे जान, झोक मत कुछु फोकट मा ।।
-रमेश चौहान

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

सिपाही

जीना मरना देश बर, जेखर हे पहिचान ।
डटे सिपाही रात दिन, धरे हाथ मा जान ।।
धरे हाथ मा जान, लड़य सीमा मा जाके ।
रखय देश मा शांति, जान अपने गंवाके ।
अमर होबे ‘रमेश‘, काम अइसन तै करना ।
जिनगी का हे यार, एक दिन जीना मरना ।।

बुधवार, 28 जनवरी 2015

कोन हर करथे अइसने

रूखवा चिखय न फर अपन, फर मा जावय टूट ।
नदिया पानी ले भरे, पिये न एको घूट।
पिये न एको घूट, गाय हर दूध ल अपने ।
धर मनखे के जात, कोन हर करे अइसने ।।
सब जानथे ‘रमेश‘, मिले हे ऐमा दुखवा ।
सब झन खोजे छांव, बने ना कोनो रूखवा ।।

सोमवार, 12 जनवरी 2015

तिवरा भाजी

तिवरा भाजी रांध ओ, सुघ्घर भुंज बघार ।
हरियर मिरचा डार दे, बने रहय ना झार ।।
बने रहय ना झार, बुरक दे धनिया पत्ती ।
अइसन भाजी भात, मिठाथे मोला अत्ती ।
तै अउ लाबे टोर, खेत मा लहसे भाजी ।
चुरकी रख बे जोर,सूखसा तिवरा भाजी ।।

चुनई

चुनई आगे गांव मा, मौका हे अदभूत ।
पंच बने बर गांव के, धरे महूॅं ला भूत ।
धरे महूॅं ला भूत, जीतना हे कइसनो ।
टूरा मन बर दारू, छोकरी मन बर इसनो
लुगरा साटी बांट, छोड़ देना हे गुनई ।
रूपया पइसा बांट, जीत जाना हे चुनई ।।

मोर छत्तीसगढ़ के नारी

     मोर छत्तीसगढ़ के नारी । दया मया के हे चिन्हारी
    नारी तो परिवार बनाथे । जेखर ले घर कुरिया भाथे
  
    बेटी दुलौरीन मइके के  । बहू लाजवंती ससुरे के
    पति के ओ हर परम पियारी । नोनी बाबू के महतारी

    पग पग मा पति ला सम्हारय । लइका मन बर जिनगी हारय
    सास ससुर के जतन बजावय । नाता दारी सबो निभावय

    सुत उठ के बड़े बिहनिया । महतारी अउ बेटी धनिया
    छर्रा छिटा गली मा देवय । जब गोबर कचरा कर लेवय

    बहरय बटोरय लिपय कुरिया । बरतन भड़वा मांजय करिया
    तब रांधय गढ़य बने जेवन । खवा पिया लय त खाय एमन

    सबो काम बूता ओ करथे । घर के लक्ष्मी कोठी भरथे
    भीतर बाहिर बूता करथे । देख काम टूरा मन जरथे

    खेतहारिन ह खेत कमाथे । बनिहारिन दू पैसा लाथे
    मास्टरिन बने हे बहुते झन । डाक्टरिन घला हे ऐही मन

    हवे कलेक्टर अउ इंजिनियर । इखरे ले देष बने हरियर
    करय मरद जउन जउन बूता । नारी मन घला करय बहुता

    एमन चाहे कुछु काम करय । घर परिवारे बर जियय मरय
    त्याग तपस्या इखरे भारी  । तब कहाय एमन महतारी

रविवार, 4 जनवरी 2015

दरूहा

दरूहा हे भवरा असन, दारू हवय रस फूल ।
भवरा चूसय फूल ला, चाहे गड़जय शूल ।।
चाहे गड़जय शूल, चिथा जय चाहे डेना ।
करे कहां परवाह, पिये से मतलब हे ना ।।
पिअय नही ‘रमेश‘, कथे मोला सब करूहा ।
गांव गांव हर सहर, सबे घर होगे दरूहा ।।

शनिवार, 3 जनवरी 2015

मत्तगयंद सवैया

पूस धरे जुड़ कापत आवत,
देखत घाम लजावत भागे ।
बादर हे बरसे कुहरा जब,
सूरज देव लुकाय लजाके ।।
फूल झरे अइलावत जाड़ म
डार सफेद करा जब छागे ।
सोवत हे मनखे मुड़ तोपत,
लात सकेलत जाड़ ल पाके ।

-रमेश चौहान

अनदेखी

देखा देखी के चलन, अनदेखी ग कहाय ।
अपने मन अनदेखना, कइसे तोला भाय ।।
कइसे तोला भाय, पेट मा पीरा होथे ।
ओ रद्दा मा तोर, लुका के काटा बोथे ।।
करत हे गा ‘रमेश‘, ओखरो लेखा लेखी ।
आज नही ता काल, करे बर देखा देखी ।।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

ठउर घूमे के तरिया

तरिया नरवा गांव के, हिल स्टेसन तो आय ।
लइका बच्चा मन जिहां, घूमे बर तो जाय ।।
घूमे बर तो जाय, रोज संझा सब जहुंरिया ।
जुरमिल बइठे पार, धरे मोबाइल करिया ।।
आनी बानी गोठ, ओरसावय सब चरिया ।
निस्तारी के संग, ठउर घूमे के तरिया ।।