सरग-नरक हा मनोदशा हे, जे मन मा उपजे । बने करम हा सुख उपजाये, सरग जेन सिरजे ।। जेन करम हा दुख उपजाथे, नरक नाम धरथे । करम जगत के सार कहाथे, नाश-अमर करथे ।। बने करम तै काला कहिबे, सोच बने धरले । दूसर ला कुछु दुख झन होवय, कुछुच काम करले ।। दूसर बर गड्ढा खनबे ता, नरक म तैं गिरबे । अपन करम ले कभू कोखरो, छाती झन चिरबे ।।
कहिनी:पानी हे अमोल -डोरेलाल कैवर्त
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“‘ बिन पानी नि हे जिनगानी* ” ए कहना सोलाआना सिरतोन आय । पानी के बिना जिनगी
जिए के कल्पना घलो नि करे जा सके ? हमन सबो जानत हांवन…
5 हफ़्ते पहले