ले मनखेपन सीख । नोनी देवय भीख कोनो मरय न भूख । होय न भले रसूख उघरा के तन ढाक । नंगरा ल झन झाक भूखाये बर भात । रोवइया बर बात हमरे देश सिखाय । नोनी सुघर निभाय देखत बबा अघाय । दूनो हाथ लमाय देवय बने अशीष । दिल के रहव रहीस नोनी करय सवाल । काबर अइसन हाल मांगे काबर भीख । सुनके लागय बीख बबा हा गुनमुनाय । चेथी ला खजुवाय का नोनी ल बतांव । कइसे के समझांव मोरो तो घरद्वार । रहिस एक परिवार बेटा बहू हमार । हवय बड़ होशियार पढ़े लिखे जस भेड़ । हे खजूर कस पेड़ ओ बन सकय न छांव । छोड़ रखे अब गांव न अपन तीर बलाय । न मन मोर बहलाय जांगर मोर सिराय । कइसे देह कमाय करथे बवाल पेट । तभे धरे हंव प्लेट नोनी तैं हर बाढ़ । रखबे बात ल काढ़ जाबे जब ससुरार । धरबे बात हमार
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
1 हफ़्ते पहले