चाल बदल गे ढाल बदल गे, जब ले आए कोरोना । काम बंद हे दाम बंद हे, परगे हे हमला रोना ।। काम-बुता के लाले परगे, कइसे अब होय गुजारा । कतका हम डर्रावत रहिबो, परय न पेट म जब चारा । रोग बड़े हे के पेट बड़े, संसो हे गा बड़ भारी । कोरोनो-कोरोना चिहरत, कभू मिटय न अंधियारी ।। घर मा घुसरे-घुसरे संगी, दू पइसा घला न आवय । काम-बुता बिन पइसा नइ हे, पइसा बिन कुछु ना भावय ।। दूनों कोती ले मरना हे, कइसे के जीबो संगी । घुसर-घुसरे घर मा मरबो, बाहिर कोरोना जंगी ।। ऊँपर वाले कुछु तो सोचव , कइसन हे तोर तमासा । जीयन देबे ता जीयन दे, टूटत हे तोरे आसा ।।
पुरु-उर्वशी-आदर्श उज्जवल उपाध्याय
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वाक्यों, विचार, भावुकता परनेत्रों पर और सरलता पर,देवत्व तिरस्कृत कर उस
दिनउर्वशी मुग्ध थी नरता पर,अप्सरा स्वर्ग की, नारी बनपृथ्वी के दुख सुख सहने
को,स्वीका...
3 दिन पहले